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क्या आपने कभी महसूस किया है कि ज़िंदगी के सबसे कठिन पलों में एक छोटी-सी बात दिल को छू जाती है और सब कुछ बदल देती है? वही एहसास जब आपको Shayari Haven पढ़ते समय होता है, तो समझ लीजिए कि आप सही जगह पहुँच गए हैं। हमारा “शायरी हैवन” सिर्फ एक और वेबसाइट नहीं है। यह उन लोगों का ठिकाना है जो दिल की गहराई से निकली शायरी को सिर्फ पढ़ना नहीं, बल्कि उसे जीना चाहते हैं। यहाँ आपको मिलेंगे सबसे शुद्ध, सटीक और जीवन छू लेने वाले Shayari Haven के अनमोल शब्द
Karma Bhagavad Gita Quotes
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (भगवद गीता 2.47)
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। कर्मफल को अपना लक्ष्य मत बनाओ और अकर्म में भी आसक्त मत हो।
जीवन बदलने वाली बात: फल की चिंता छोड़कर सिर्फ कर्म पर ध्यान दो, तनाव और असफलता का डर अपने आप खत्म हो जाता है।
योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ (भगवद गीता 2.48)
अर्थ: हे अर्जुन! योग में स्थित होकर, आसक्ति त्यागकर कर्म करो। सफलता और असफलता में समान रहना ही सच्चा योग है।
जीवन बदलने वाली बात: जीत-हार, लाभ-हानि में समभाव रखने से मन हमेशा शांत रहता है।
योगः कर्मसु कौशलम्। (भगवद गीता 2.50)
अर्थ: योग का मतलब है कर्मों में कुशलता।
जीवन बदलने वाली बात: जो काम करो, उसे पूरी कुशलता और समर्पण से करो — यही असली योग है।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥ (भगवद गीता 2.51)
अर्थ: बुद्धिमान पुरुष कर्मजनित फल को त्यागकर जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और दुःख-रहित पद को प्राप्त करते हैं।
जीवन बदलने वाली बात: फल छोड़ने से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग खुलता है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥ (भगवद गीता 3.5)
अर्थ: कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सबको कर्म करने के लिए मजबूर करते हैं।
जीवन बदलने वाली बात: भाग्य के नाम पर बैठने की आदत छूटती है — कर्म करना ही जीवन का स्वभाव है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ (भगवद गीता 3.6)
अर्थ: जो कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मूढ़ और मिथ्याचारी कहलाता है।
जीवन बदलने वाली बात: सिर्फ बाहर से कर्म छोड़ना काफी नहीं, मन को भी नियंत्रित करना जरूरी है।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥ (भगवद गीता 3.7)
अर्थ: जो इंद्रियों को मन से वश में रखकर आसक्तिरहित होकर कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग करता है, वही श्रेष्ठ है।
जीवन बदलने वाली बात: नियंत्रण और अनासक्ति के साथ कर्म करने वाला व्यक्ति सबसे ऊँचा उठता है।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥ (भगवद गीता 3.8)
अर्थ: अपना नियत कर्म करो। कर्म करना अकर्म से श्रेष्ठ है। अकर्म से तो शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।
जीवन बदलने वाली बात: आलस छोड़कर अपने कर्तव्य को निभाने की मजबूत प्रेरणा मिलती है।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥ (भगवद गीता 3.9)
अर्थ: यज्ञ (ईश्वर/कल्याण) के लिए किए गए कर्म के अलावा बाकी कर्म बंधन पैदा करते हैं। इसलिए आसक्ति छोड़कर कर्म करो।
जीवन बदलने वाली बात: काम को बड़े उद्देश्य के लिए करने से बोझ हल्का हो जाता है।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (भगवद गीता 3.21)
अर्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो उदाहरण प्रस्तुत करता है, समाज उसका अनुसरण करता है।
जीवन बदलने वाली बात: खुद सही कर्म करो, बाकी लोग स्वतः प्रभावित होंगे।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ (भगवद गीता 3.22)
अर्थ: हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है, न कुछ अप्राप्त है जो मुझे प्राप्त करना हो, फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।
जीवन बदलने वाली बात: पूर्ण होने के बावजूद कर्म करते रहना — यही सच्चा आदर्श है।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ (भगवद गीता 3.23)
अर्थ: यदि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ तो सब मनुष्य मेरे मार्ग का अनुसरण करेंगे।
जीवन बदलने वाली बात: नेता या माता-पिता का आचरण समाज को दिशा देता है।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥ (भगवद गीता 3.24)
अर्थ: यदि मैं कर्म न करूँ तो ये लोक नष्ट हो जाएँगे और मैं वर्णसंकर का कारण बनकर प्रजाओं का नाश करूँगा।
जीवन बदलने वाली बात: कर्म न करने से समाज और व्यवस्था दोनों बिगड़ते हैं।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥ (भगवद गीता 3.25)
अर्थ: जैसे अज्ञानी आसक्तिपूर्वक कर्म करते हैं, वैसे ही विद्वान को लोकसंग्रह के लिए अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए।
जीवन बदलने वाली बात: ज्ञानवान व्यक्ति भी समाज के हित के लिए कर्म करता है।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥ (भगवद गीता 3.26)
अर्थ: अज्ञानी और कर्म में आसक्त लोगों की बुद्धि में भेद उत्पन्न न करे। विद्वान स्वयं युक्त होकर सब कर्म करता हुआ उन्हें भी उसी में लगाए।
जीवन बदलने वाली बात: दूसरों को गलत रास्ते पर ले जाने के बजाय खुद सही उदाहरण बनो।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ (भगवद गीता 3.27)
अर्थ: सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, पर अहंकार से मोहित व्यक्ति अपने को कर्ता मानता है।
जीवन बदलने वाली बात: “मैंने किया” का अहंकार छोड़ने से कर्म का बोझ हट जाता है।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ (भगवद गीता 3.28)
अर्थ: तत्व को जानने वाला गुण और कर्म के विभाग को समझकर यह जान लेता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, इसलिए आसक्त नहीं होता।
जीवन बदलने वाली बात: सही ज्ञान से आसक्ति और अहंकार दोनों खत्म हो जाते हैं।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। (भगवद गीता 3.35)
अर्थ: अपने धर्म (कर्तव्य) में मरना भी श्रेयस्कर है, दूसरे का धर्म भय उत्पन्न करने वाला है।
जीवन बदलने वाली बात: दूसरों की नकल छोड़कर अपने स्वभाव के अनुसार जीने की ताकत मिलती है।
अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥ (भगवद गीता 3.36)
अर्थ: हे वार्ष्णेय! फिर मनुष्य किससे प्रेरित होकर अनिच्छा होते हुए भी बलपूर्वक पाप करता है?
जीवन बदलने वाली बात: पाप करने की जड़ को समझने से नियंत्रण की शुरुआत होती है।
श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥ (भगवद गीता 3.37)
अर्थ: यह काम और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। ये बड़े भक्षक और महापापी हैं — इन्हें ही यहाँ शत्रु जानो।
जीवन बदलने वाली बात: काम और क्रोध को पहचानकर उन पर विजय पाने का मार्ग खुलता है।
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥ (भगवद गीता 5.8)
अर्थ: तत्व को जानने वाला योगी सोचता है कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ — चाहे वह देख रहा हो, सुन रहा हो, छू रहा हो, खा रहा हो, चल रहा हो या सांस ले रहा हो।
जीवन बदलने वाली बात: अहंकार (“मैंने किया”) खत्म हो जाता है। काम करते हुए भी मन मुक्त रहता है।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (भगवद गीता 5.10)
अर्थ: जो कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके आसक्ति त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से उसी तरह नहीं लिप्त होता जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं भीगता।
जीवन बदलने वाली बात: कर्म को ईश्वर को समर्पित करने से पाप और बंधन दोनों से मुक्ति मिलती है।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥ (भगवद गीता 5.11)
अर्थ: योगी शरीर, मन, बुद्धि और केवल इंद्रियों से आसक्ति त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
जीवन बदलने वाली बात: हर कर्म को आत्मशुद्धि का साधन बनाने से जीवन पवित्र हो जाता है।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥ (भगवद गीता 5.12)
अर्थ: युक्त पुरुष कर्मफल त्यागकर परम शांति पाता है, जबकि अयुक्त पुरुष कामना के कारण फल में आसक्त होकर बंध जाता है।
जीवन बदलने वाली बात: फल छोड़ने वाला शांत रहता है, आसक्त रहने वाला बंधन में फँसता है।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥ (भगवद गीता 5.13)
अर्थ: जो मन से सब कर्मों का संन्यास करके इंद्रियों को वश में रखता है, वह नौ द्वार वाले शरीर में रहता हुआ भी न करता है, न करवाता है।
जीवन बदलने वाली बात: मन से त्याग करने वाला शरीर में रहते हुए भी मुक्त रहता है।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥ (भगवद गीता 5.14)
अर्थ: परमेश्वर न कर्तृत्व की सृष्टि करता है, न कर्मों की, न कर्मफल के संयोग की। स्वभाव ही सबको प्रवृत्त करता है।
जीवन बदलने वाली बात: सब कुछ प्रकृति के स्वभाव से होता है — अहंकार व्यर्थ है।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं लभते नरः। (भगवद गीता 18.46)
अर्थ: मनुष्य अपने कर्म से उस परमेश्वर की पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है।
जीवन बदलने वाली बात: अपना काम ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ (भगवद गीता 18.47)
अर्थ: गुणरहित अपना धर्म भी अच्छी तरह से किए गए परधर्म से श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करने वाला पाप को नहीं प्राप्त होता।
जीवन बदलने वाली बात: अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने से पाप नहीं लगता।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ (भगवद गीता 18.48)
अर्थ: हे कौन्तेय! सहज कर्म को दोषयुक्त होने पर भी न छोड़ो। सभी आरंभ दोष से वैसे ही ढके होते हैं जैसे अग्नि धुएँ से।
जीवन बदलने वाली बात: हर काम में कुछ न कुछ दोष होता है — फिर भी अपना कर्तव्य न छोड़ो।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥ (भगवद गीता 18.49)
अर्थ: जिसकी बुद्धि सब जगह अनासक्त है, जो जितात्मा और स्पृहारहित है, वह संन्यास से परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
जीवन बदलने वाली बात: अनासक्ति और आत्मसंयम से कर्म करते हुए भी कर्म से मुक्त हुआ जा सकता है।
Karma Bhagavad Gita Quotes in Sanskrit

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥**
(भगवद्गीता 3.5)
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥**
(भगवद्गीता 3.25)
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥**
(भगवद्गीता 3.27)
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥**
(भगवद्गीता 3.28)
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥**
(भगवद्गीता 3.30)
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्दावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥**
(भगवद्गीता 3.31)
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥**
(भगवद्गीता 3.26)
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥**
(भगवद्गीता 3.20)
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥**
(भगवद्गीता 3.13)
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥**
(भगवद्गीता 3.16)
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥**
(भगवद्गीता 4.20)
*निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥**
(भगवद्गीता 4.21)
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥**
(भगवद्गीता 4.23)
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥**
(भगवद्गीता 4.33)
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥**
(भगवद्गीता 5.7)
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQs
1. भगवद गीता में कर्म का क्या महत्व है?
भगवद गीता के अनुसार मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। निष्काम भाव से किया गया कर्म ही सच्चा धर्म माना गया है।
2. सबसे प्रसिद्ध कर्म श्लोक कौन-सा है?
भगवद गीता का सबसे प्रसिद्ध कर्म श्लोक है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”
यह श्लोक कर्म करते रहने और परिणाम की चिंता न करने का संदेश देता है।
3. Karma Bhagavad Gita Quotes का मुख्य संदेश क्या है?
इन उद्धरणों का मुख्य संदेश है कि व्यक्ति को ईमानदारी, समर्पण और निस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। सफलता और असफलता की चिंता किए बिना कर्म करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।
4. क्या कर्म के बिना सफलता संभव है?
भगवद गीता के अनुसार बिना कर्म के कोई भी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। निरंतर प्रयास और सही कर्म ही सफलता का आधार हैं।
5. निष्काम कर्म क्या होता है?
निष्काम कर्म का अर्थ है बिना किसी स्वार्थ या फल की इच्छा के अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाना। यही गीता का प्रमुख संदेश है।
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